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“With India being one of the most vulnerable nations to climate change impacts, if the Aravallis are not protected as a conservation belt and opened for commercialisation, it will lead to increase in air pollution and water shortage making India’s National Capital Region uninhabitable. Aravalli zoo safari project in its current avatar needs to be scrapped,” said the ‘Waterman of India’ Dr Rajendra Singh who has decades of experience in reviving water bodies and regenerating degraded areas in the Aravallis and other states in India.

Prerna Bindra, India’s leading conservationist who has worked with the government to conserve India’s wild habitats states, “Aravallis are one of the oldest mountain ranges in the world, have a unique ecology and support a wide diversity of wildlife. What is critically needed is to protect the Aravallis. Any tourism – low impact and benefitting local communities must be based on it’s native flora and fauna. Aravallis in the proposed 10,000 acres of the safari park in Gurugram and Nuh are extremely degraded as a result of illegal mining going on despite the Supreme Court ban. Native forest restoration of the Aravallis in this belt will contribute to India’s Nationally Determined Contributions and improve Haryana’s abysmally low forest cover which is currently a meagre 3.6% and well below the national average of 21%. Strict guidelines should be developed for water usage. Monitoring of Aravalli aquifers and groundwater tables must be done. Ecological restoration must be implemented through an agency with proven track record in a smaller area i.e. about 10-25% of the total area (10,000 acres) in phase one. Adapt and sustain to restore ecosystem services and make the model self-sustaining, cost neutral and then revenue generating. Then, scale and replicate to the full area.”

Dr. Ghazala Shahabuddin, an ecologist working on biodiversity conservation in India and Asia says, “Aravallis are a rich biodiversity hotspot and wildlife habitat and are home to 400+ species of native trees, shrubs, herbs, medicinal plants & grasses; 200+ native & migratory bird species, 100+ butterfly species, 20+ reptile species and 20+ mammal species as well as other wildlife like insects, amphibians etc. The entire stretch of 10,000 acres of the Aravallis should be either declared as a ‘Protected Area’ and then opened for nature, wildlife tourism of existing native flora and fauna. Alternatively, a ‘network of strictly protected zones and community reserves or biodiversity heritage sites’ can also be considered to conserve the 10,000 acres, where local rural communities along with the Forest department can hold rights to tourism and restricted forest use. Tourism department should have no role in this area. A protection plan must be put into place. Sufficient number of forest guards or any such appropriate authority along with community guards should be the primary defence to protect the wildlife of the region. This must be supplemented with Advanced Drone Technology as a monitoring tool to regulate and control illegal encroachments and mining activities in this area.”

Dr Pia Sethi, another ecologist states: “Aravallis can be positioned as nature and wilderness zones to attract high value nature-based tourism. Aravalli hills and forests also offer a great experience of trekking, hiking, cycling, adventure activities and nature-based sport like rock climbing, camping in the wilderness, guided birdwatching trips, wildlife tourism, nature walks to help people unwind from the hustle-bustle of busy life in the cities. Many countries such as Japan, South Korea and Finland have created “healing spaces” by leveraging their forests and natural habitats. Aravallis in Haryana can be used as a range dotted with “healing spaces” and forest immersion experiences where overloaded minds and overworked bodies can come and find mental peace, solace and good health. Creating these “healing spaces” will boost local employment, help sustain biodiversity around the area and benefit the state economy in a sustainable way. This can be done by developing concept of ‘Learning From Nature’ by organising healing forest walks, nature meditations, forest art workshops; organising sessions where elders and locals share forest wisdom, doing action projects that give back to nature, setting up forest schools and nature camps for children to learn from the wild. Nature tourism will also benefit the villagers by contributing positively to the local economy through home stays and villagers being employed as guides and for many other things. Sustained revenue can be generated in this model at lower investment. Haryana government can showcase this as a case study in conservation in and around an urban area.”

Ritika Dubey from the Aravalli Bachao Citizens Movement states, “We urge the government to form a Committee to design and oversee the implementation of a conservation plan for this 10000 acres of Aravallis in Gurugram and Nuh consisting of atleast 50% representatives from citizens’ movements, local rural communities and noted experts in the field of conservation, rewilding, wildlife, hydrology, waste management, etc. along with forest department and other government officials. Supreme Court and National Green Tribunal should approve the conservation plan and also nominate experts to be part of the Committee.”

संरक्षणवादियोंने ‘ चिड़ियाघरसफारीपरियोजना’ कोरद्दकरनेकाआह्वानकियाऔरअरावलीकी 10,000 एकड़जमीनकेइकोसिस्टमपुनरुद्धारकेलिएएकवैकल्पिकयोजनाकासुझावदिया

  “जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के मामले में भारत वैसे ही सबसे कमजोर देशों में से एक है, और अगर अरावली को   संरक्षण नहीं दिया जाता है और व्यावसायीकरण के लिए खोल दिया जाता है तो इससे वायु प्रदूषण में और वृद्धि होगी और इसके कारण होने वाली पानी की कमी भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को निर्जन बना देगी।  ‘अरावली चिड़ियाघर सफारी’ परियोजना पर उसके वर्तमान स्वरूप में बिल्कुल  भी अमल नहीं किया जा सकता।” भारत के जलपुरुष कहे जाने वाले, डॉ राजेंद्र सिंह  ने कहा , जिनके पास अरावली और भारत के अन्य राज्यों के जलाशयों को और बंजर  क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने का दशकों का अनुभव है।

 प्रेरणा बिंद्रा, भारत की प्रमुख संरक्षणवादी, जिन्होंने भारत के जंगली आवासों के संरक्षण के लिए सरकार के साथ काम किया है, ने कहा , “अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, और अपने अनूठे इकोसिस्टम के कारण, यह वन्यजीवों की व्यापक विविधता को अपने अंदर समेटे रखती है। अरावली की रक्षा के लिए ज़रूरी है कि  यहां होने वाला कोई भी पर्यटन  इसपर बहुत कम प्रभाव डाले‌ और स्थानीय लोगों को लाभ पहुँचाये ।‌ साथ ही वह  उसकी मूल वनस्पतियों और जीवों के संरक्षण  पर आधारित हो।  सुप्रीम कोर्ट के लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद चल रहे अवैध खनन के परिणामस्वरूप, गुरुग्राम और नूंह के जिस  10,000 एकड़ में  सफारी पार्क बनाने का प्रस्ताव है ,‌ वहां अरावली की स्थिति पहले से ही बेहद खराब है। इस बेल्ट में अगर अरावली के  मूल वन को बहाल  किया जाए तो उससे  राष्ट्रीय रूप से निर्धारित किए जाने वाले योगदान में वृद्धि होगी और हरियाणा के वन क्षेत्र के प्रतिशत में भी इजाफा होगा। अभी हरियाणा के सिर्फ 3.6% क्षेत्र  में ही फॉरेस्ट कवर है ,जो 21% के राष्ट्रीय औसत  से बहुत ही कम है । पानी के उपयोग के लिए सख्त दिशा-निर्देश विकसित किए जाने चाहिए। अरावली की सतह से नीचे के जल स्त्रोतों और जल स्तर की स्थिति पर लगातार नजर रखी जानी चाहिए। इकोसिस्टम की बहाली के कार्य को पहले चरण में, एक छोटे क्षेत्र में ( 10000 एकड़ का करीब 10 से 25%) किसी अनुभवी, अच्छे ट्रैक रिकॉर्ड वाली एजेंसी के माध्यम से लागू किया जाना चाहिए।  इकोसिस्टम को बहाल करने के लिए एक  आत्मनिर्भर, कम लागत  और फिर राजस्व उत्पन्न करने वाला मॉडल तैयार करना चाहिए। छोटे क्षेत्र में इस मॉडल के सफल परीक्षण होने के बाद फिर उसे  पूरे क्षेत्र में लागू करना चाहिए।”

भारत और एशिया में जैव विविधता संरक्षण पर काम कर रही इकोलॉजिस्ट डॉ. ग़ज़ाला शहाबुद्दीन कहती हैं, “अरावली एक समृद्ध जैव विविधता हॉटस्पॉट और वन्यजीव निवास स्थान है और देशी पेड़ों, झाड़ियों, जड़ी-बूटियों, औषधीय पौधों और घासों की 400+ प्रजातियों का घर है। 200+ देशी और प्रवासी पक्षी प्रजातियाँ, 100+ तितली प्रजातियाँ, 20+ सरीसृप प्रजातियाँ और 20+ स्तनपायी प्रजातियाँ और साथ ही अन्य वन्यजीव जैसे कीड़े, उभयचर आदि भी यहां पाए जाते है।  अरावली के 10,000 एकड़ के इस पूरे हिस्से को ‘संरक्षित वन क्षेत्र ‘ घोषित कर   प्राकृतिक और वन्यजीव पर्यटन के लिए खोला जाना चाहिए । इस 10000 एकड़ के संरक्षण के लिए एक ऐसा नेटवर्क भी बनाया जा सकता है, जिसमें संरक्षण नियम पूरी तरह से लागू हों या जिसे जैव विविधता की विरासत के समान समझा जाए और जिसमें स्थानीय ग्रामीणों और वन विभाग को पर्यटन और वन के उपयोग के लिए सीमित अधिकार दिए जाएं। इस क्षेत्र में पर्यटन विभाग की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। एक सुरक्षा योजना लागू की जानी चाहिए। क्षेत्र के वन्य जीवों की रक्षा के लिए पर्याप्त संख्या में वन रक्षकों या सामुदायिक गार्डों का प्रावधान होना चाहिए। इस क्षेत्र में अवैध अतिक्रमण और खनन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए और इनपर  निगरानी रखने के लिए, आधुनिक  ड्रोन टेक्नालॉजी का उपयोग किया जाना चाहिए। “

नेहा सिन्हा, एक संरक्षण जीवविज्ञानी और दिल्ली स्थित लेखिका  का कहना है: “अरावली को प्राकृतिक और जंगल क्षेत्र पर आधारित पर्यटन स्थल की तरह विकसित किया जा सकता है, जो उच्च स्तर के पर्यटकों  को आकर्षित  कर सके, जिन्हें  प्रकृति के साथ जुड़े पर्यटन में रुचि होती है। अरावली की पहाड़ियों और जंगलों में   पर्यटकों को ट्रेकिंग, लंबी पैदल यात्रा, साइकिल चलाना, साहसिक गतिविधियों और प्रकृति से जुड़े  खेल जैसे रॉक क्लाइम्बिंग, जंगल में कैम्पिंग, गाइडेड बर्डवॉचिंग ट्रिप, वाइल्डलाइफ टूरिज्म, नेचर वॉक जैसे बहुत से शानदार अनुभव प्रदान किए जा सकते हैं, जो लोगों को अपने  व्यस्त जीवन की भाग दौड़ से राहत दिला सकते हैं।  जापान, दक्षिण कोरिया और फ़िनलैंड जैसे कई देशों ने अपने जंगलों और प्राकृतिक आवासों का लाभ उठाकर “उपचार स्थान” बनाए हैं। हरियाणा में अरावली के अन्दर खूब सारी  “हीलिंग स्पेस” बनायी  जा सकती हैं, जहां शारिरिक रूप से थके हुए और मानसिक बोझ से दबे लोग सुख और शांति का अनुभव कर सकते हैं  और अपने  स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं। इन “हीलिंग स्पेस” को बनाने से स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, क्षेत्र के आसपास जैव विविधता को बनाए रखने में मदद मिलेगी और राज्य की अर्थव्यवस्था को स्थायी रूप से लाभ होगा। ‘लर्निंग फ्रॉम नेचर’ की अवधारणा को विकसित करते हुए यहाँ हीलिंग फ़ॉरेस्ट वॉक, नेचर मेडिटेशन, फ़ॉरेस्ट आर्ट वर्कशॉप इत्यादि आयोजित की जा सकती हैं। ऐसे सत्र आयोजित किए जा सकते हैं, जहां बुजुर्ग और स्थानीय लोग वनों के बारे में अपना ज्ञान  सांझा करें।‌  ऐसी कार्य परियोजनाएं प्लान की जाएं , जो प्रकृति से लेने की जगह  उसे देने पर आधारित हों। बच्चों के लिए वन स्कूल और प्राकृतिक शिविर स्थापित किये जाएं। नेचर टूरिज्म के माध्यम से ग्रामीण लोग भी स्थानीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक योगदान दे सकेंगे।  होम स्टे को बढ़ावा दिया जा सकता है और ग्रामीण लोग  गाइड की तरह से  भी काम कर सकते हैं । इस मॉडल से कम निवेश द्वारा, निरंतर राजस्व उत्पन्न किया जा सकता है। हरियाणा सरकार इसे शहरी क्षेत्र के आसपास के  इलाके के संरक्षण  की केस स्टडी के रूप में प्रदर्शित कर सकती है।”

अरावली बचाओ सिटीज़न्स मूवमेंट की रितिका दुबे कहती हैं, “हम सरकार से आग्रह करते हैं कि गुरुग्राम और नूंह की अरावली के  इस 10000 एकड़  के  संरक्षण की  योजना के कार्यान्वयन एवं देखरेख के लिए एक समिति बनाई जाए, जिसके  कम से कम 50% प्रतिनिधि, नागरिक आंदोलनों , स्थानीय ग्रामीण समुदायों और  प्रख्यात विशेषज्ञों ( जो  संरक्षण, वन्य जीवन, जल विज्ञान,  कचरा प्रबंधन आदि क्षेत्रों के हों) में से लिए गए हों। साथ ही सरकारी संस्थाओं तथा वन विभाग से  भी लोग हों। सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल इस संरक्षण योजना को मंजूरी दे  और समिति का हिस्सा बनने के लिए विशेषज्ञों को भी नामित करे”


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